पटना, 8 अक्टूबर 2026
राज्य स्तरीय कार्यशाला में 19 जिलों की 195 पंचायतों में काम कर रही संस्थाओं ने साझा किए अनुभव; 27 नवंबर को पहल के औपचारिक शुभारंभ की तैयारी पटना में आयोजित राज्य स्तरीय कार्यशाला में विभिन्न जिलों से आए प्रतिभागी।
बिहार की ग्राम पंचायतों को बाल विवाह मुक्त बनाने की पहल को ज़मीनी स्तर पर ठोस दिशा देने के लिए गुरुवार को पटना में एक दिवसीय राज्य स्तरीय कार्यशाला आयोजित की गई। यूनिसेफ बिहार और पंचायती राज पीठ, चाणक्य राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय (सीएनएलयू) के संयुक्त तत्वावधान में हुई कार्यशाला में महिला एवं बाल विकास निगम, कवच परियोजना, प्रथम और सेंटर डायरेक्ट सहित कई सहयोगी संस्थाओं के प्रतिनिधि शामिल हुए।
कार्यशाला का केंद्रीय संदेश साफ़ था— घोषणा का कोई शॉर्टकट नहीं है। यूनिसेफ बिहार की ओर से मुख्य प्रस्तुति देते हुए श्री बंकू बिहारी सरकार, चाइल्ड प्रोटेक्शन स्पेशलिस्ट ने कहा कि ग्राम सभा के प्रस्ताव से शुरू होकर घोषणा और प्रमाणन तक यह लगभग 18 महीने की चरणबद्ध प्रक्रिया है। फील्ड भ्रमण के दौरान कई मुखिया दो-तीन महीनों में ही घोषणा की बात करते मिले, जबकि असली चुनौती बदलाव को टिकाऊ बनाना है। उन्होंने कहा कि संस्थाओं की भूमिका सुविधादाता और मार्गदर्शक की है, क्रियान्वयन की नहीं। “अगर हम मुखिया की जगह खुद काम करने लगेंगे, तो पूरी प्रक्रिया विफल हो जाएगी। और जब तक समस्या को स्वीकार नहीं करेंगे, उसका समाधान भी नहीं कर पाएँगे,” उन्होंने कहा।
आंकड़ों में सुधार, पर चुनौती बरकरार
राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस) के ताज़ा आंकड़ों के अनुसार बिहार में बाल विवाह की दर 40.8 से घटकर 34.6 प्रतिशत रह गई है। 38 में से 32 जिलों में गिरावट आई, पर छह जिलों में दर बढ़ी है। सहरसा 57.1 प्रतिशत के साथ सबसे ऊपर है, जबकि मुजफ्फरपुर, शिवहर, पटना और कटिहार में भी वृद्धि दिखी। सिवान 13.9 प्रतिशत के साथ राष्ट्रीय औसत से भी नीचे है और लखीसराय, गया व जमुई में उल्लेखनीय गिरावट आई है। वक्ताओं ने दोनों तरह के जिलों के अलग विश्लेषण का सुझाव दिया।
प्रो० (डॉ०) एस० पी० सिंह, चेयर प्रोफेसर, पंचायती राज ने अपने संबोधन में कहा कि हर आंकड़े के पीछे एक ज़िंदगी है। बाल विवाह कम उम्र में गर्भधारण, शिशु व मातृ मृत्यु और कुपोषण के चक्र को जन्म देता है तथा बच्चों के जीवन, विकास, संरक्षण और सहभागिता के अधिकारों का उल्लंघन है। स्कूलों में 50-55 प्रतिशत औसत उपस्थिति और कक्षा पाँच व आठ के बाद भारी ड्रॉपआउट का हवाला देते हुए 15 से 19 वर्ष के किशोर-किशोरियों को सबसे अधिक जोखिम वाला समूह बताया गया।
जिलाधिकारी देंगे प्रमाणपत्र, पोर्टल पर होगा सार्वजनिक
बताया गया कि केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ने सभी जिलाधिकारियों को इस विषय पर पत्र भेजे हैं और हाल के दिशानिर्देश में घोषणा की प्रक्रिया व प्रमाणपत्र का प्रारूप तय किया गया है। जिलाधिकारी द्वारा जारी प्रमाणपत्र भारत सरकार के पोर्टल पर अपलोड होगा। राज्य की मसौदा गाइडलाइन का औपचारिक शुभारंभ नवंबर में प्रस्तावित है।
महिला एवं बाल विकास निगम की कैपेसिटी बिल्डिंग मैनेजर रश्मि रंजन ने कहा कि निगम 2017 से इस दिशा में काम कर रहा है। उन्होंने आगाह किया कि केवल हस्ताक्षर करा लेने से घोषणा कागज़ी बनकर रह जाएगी; बदलाव ‘नीचे से ऊपर’ आना चाहिए। उन्होंने संस्थाओं से जिला स्तर पर वन स्टॉप सेंटर, डीपीएम और जिला मिशन समन्वयकों के साथ मिलकर काम करने को कहा।
कवच से अभिजीत ने कहा कि प्रतिशत घटने के बावजूद कुल संख्या अब भी बड़ी है, इसलिए आत्मसंतोष की जगह नहीं है। उन्होंने चेताया कि जल्दबाज़ी में हुई घोषणाओं के बाद किशोरावस्था में गर्भधारण बढ़ने के उदाहरण दुनिया में मिले हैं, इसलिए किशोर-किशोरियों के जीवन कौशल और भविष्य की दृष्टि पर भी काम ज़रूरी है। सेंटर डायरेक्ट के महासचिव पी.के. शर्मा ने कहा कि परिवार कानून से नहीं, संवाद से चलता है। उन्होंने वार्ड स्तर पर संवेदनशील टोलों की मैपिंग, क्षेत्र-विशेष योजना और 19 नवंबर से शुरू हो रहे लगन से पहले सामुदायिक अभियान की रणनीति बनाने पर ज़ोर दिया।
‘टाइप किया प्रस्ताव नहीं, पंचायत की अपनी भाषा’
फील्ड में दिखी गलतियों पर भी खुलकर बात हुई। निर्देश दिया गया कि आम सभा का प्रस्ताव पहले से टाइप न हो, बल्कि पंचायत रजिस्टर में स्थानीय भाषा में लिखा जाए और मुखिया अपनी ओर से कवर पत्र भेजें। चाइल्डलाइन 1098, महिला व पुलिस हेल्पलाइन और बाल विवाह निषेध पदाधिकारी के नंबर संस्थाओं के पोस्टर से नहीं, मुखिया की पहल पर गाँव की दीवारों पर लिखे जाएँ, ताकि स्वामित्व का भाव बने।
संवेदनशीलता मैपिंग को सबसे अहम चरण बताया गया। मुखिया की बुलाई बैठक में वार्ड सदस्य और आंगनबाड़ी सेविका, आशा, विकास मित्र जैसे अग्रिम पंक्ति कार्यकर्ता स्कूल से बाहर बच्चों और जोखिम वाले परिवारों की पहचान करें; फिर ऐसे परिवारों को मिशन वात्सल्य जैसी योजनाओं से जोड़ा जाए और बच्चों का पुनः नामांकन हो। व्यक्तिगत आंकड़ों की संरक्षक पंचायत ही रहेगी। विवाह निबंधन, किशोरी समूहों व जीविका के ज़रिए सामुदायिक निगरानी पर भी ज़ोर रहा। एक पंचायत में शादी के कार्ड पर अभिभावकों द्वारा वर-वधू की कानूनी आयु की घोषणा छापने की पहल का उदाहरण भी दिया गया।
जिलों से आए अनुभव
सीतामढ़ी में 15 अगस्त की ग्राम सभा में संकल्प पारित कर जिलाधिकारी कार्यालय में जमा कराया गया। सीतामढ़ी, शिवहर और पूर्वी चंपारण में प्रस्ताव से पहले जनसंवाद हुए और लगभग 20 पंचायतों ने पारित प्रस्ताव को 2 अक्टूबर की ग्राम सभा में दोहराया। लखीसराय में 30 पंचायतों में वार्ड स्तरीय मैपिंग के बाद छह पंचायतों से प्रस्ताव मिले हैं, जबकि दरभंगा में मुखिया स्वयं पंचायत स्तरीय बाल संरक्षण समिति की बैठकें करा रहे हैं। ईंट-भट्ठों पर मौसमी पलायन जैसी चुनौतियाँ भी सामने आईं।
27 नवंबर पर नज़र
फिलहाल 195 में से लगभग 30-40 पंचायतों में ही प्रस्ताव का पहला चरण पूरा हुआ है। अगला एक महीना मैपिंग, योजनाओं से जुड़ाव, पुनः नामांकन और विवाह निबंधन पर केंद्रित रखने तथा प्रगति रिपोर्टिंग पोर्टल पर दर्ज करने को कहा गया। संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 4 सितंबर 2026 को 27 नवंबर को बाल, कम उम्र एवं जबरन विवाह उन्मूलन का अंतरराष्ट्रीय दिवस घोषित किया है; भारत में इसी दिन 2024 में ‘बाल विवाह मुक्त भारत’ अभियान शुरू हुआ था। इस अवसर पर राज्य में पहल का औपचारिक शुभारंभ प्रस्तावित है। वक्ताओं ने दोहराया कि लक्ष्य केवल शादी को 18 वर्ष तक टालना नहीं, बल्कि किशोर-किशोरियों को अपने पैरों पर खड़ा होने का अवसर देना है।
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प्रो० (डॉ०) एस० पी० सिंह
चेयर प्रोफेसर, पंचायती राज,
चाणक्य राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय, पटना